March 26, 2026 5:10 am

विजयादशमी पर बोले संघ प्रमुख – स्वदेशी अपनाएं, समाज में नैतिक बदलाव जरूरी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी समारोह और विजयादशमी उत्सव नागपुर में आयोजित हुआ। इस विशेष अवसर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी उपस्थित रहे।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि आरएसएस ने 100 वर्षों की यात्रा पूरी कर ली है। उन्होंने स्वदेशी अपनाने की अपील की और पड़ोसी देशों में चल रही उथल-पुथल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जब सरकारें जनता से दूर हो जाती हैं और उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करती हैं, तो असंतोष बढ़ता है। लेकिन हिंसक क्रांतियों या विरोधों से कोई लाभ नहीं होता। इससे देश के बाहर की ताकतों को हस्तक्षेप करने का अवसर मिल जाता है।

मोहन भागवत ने जोर दिया कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर आशा की नजर से देख रही है। देश की युवा पीढ़ी में राष्ट्र और संस्कृति के प्रति प्रेम बढ़ा है। समाज स्वयं समस्याओं के समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बुद्धिजीवी वर्ग भी देशहित में चिंतन कर रहा है।

उन्होंने पर्यावरणीय संकट की ओर भी ध्यान दिलाया। लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाएं, भूस्खलन और भारी वर्षा को गंभीर बताते हुए कहा कि हिमालय की स्थिति चेतावनी का संकेत है। उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास मॉडल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

भागवत ने यह भी कहा कि केवल भौतिक विकास पर्याप्त नहीं है। नैतिक और आध्यात्मिक विकास भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर भारत को अमेरिका जैसा बनना है, तो पांच पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। इसलिए भारत को अपना अलग विकास मॉडल अपनाना चाहिए, जो मानवता पर आधारित हो।

उन्होंने धर्म की सही परिभाषा देते हुए कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या खान-पान नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था है जो सबको साथ लेकर चलती है और सबके कल्याण की बात करती है। ऐसी दृष्टि भारत को दुनिया को देनी होगी।

अपने भाषण की शुरुआत में मोहन भागवत ने गुरु तेग बहादुर के बलिदान का 350वां वर्ष, महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती का स्मरण किया और उन्हें देशभक्ति, त्याग और भक्ति का प्रतीक बताया।

संघ प्रमुख ने कहा कि आज का समाज सक्षम महसूस कर रहा है और यह परिवर्तन का समय है। लेकिन बदलाव धीरे-धीरे और सोच-समझकर करना होगा। उन्होंने कहा कि जैसी समाज की दृष्टि होगी, वैसी ही व्यवस्था बनेगी। इसलिए सबसे पहले समाज के आचरण में बदलाव जरूरी है।

समारोह के माध्यम से संघ ने न केवल अपने सौ वर्षों की यात्रा को स्मरण किया, बल्कि आगे की दिशा और सोच भी देश के सामने रखी।

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